थी दिन भर की थकान,
शाम को हाथ में मेरे डायरी और कलम,
एक कप कड़क आसमी चाय,
ठंडा मौसम और बालकनी में थे हम,
मन थक सा गया था, और हाथ रुक सा गया था,
लेकिन रोमांचित सी तुम्हारी यादें,
और कड़क आसमी चाय की गर्माहटें।
ना चाहते हुए भी मन वारंगल सा सोचने,
और हाथ लिखने पर मजबूर हुआ,
क्या पाने को आखिर तुझसे इतना मैं दूर हुआ?
यह सोच मन एक बार फिर विचलित सा कुंठित हुआ,
रुकने वाला था हाथ तभी अचानक
सिक्किमी बारिश ने मन को झकझोर दिया।
उफ्फ् ये आसमी चाय, सिक्किमी वर्षा,
दूनी सी वादियां, और दिल हमारा मनाली हुआ।
लेह नगर अंबाला पानीपत के जयपुर,
शिमला से हम चांदनी चौक में,
देखी सूरत तेरी गांधीनगर,
गया बनारस भुवनेश्वर जाकर।
हो रही थी सांझ दीमापुर,
मोकोकचुंग था व्यस्त बड़ा शिलांग।
पहुंचे थे जीरो वैली, कल-कल करती जलपाईगुड़ी,
विश्राम किए हम घाटशिला।
तातोपानी से पिए थे पानी, रुके थे हम उज्जैन।
ट्रेन पकड़ी थी नासिक से, पणजी से गुंटूर दिखा,
श्रीशैलम अरविले में खाए थे हम बादामी आम।
श्रीरंगपट्टनम में गाड़ी रुकी,
उतरे थे विप्रस लैण्ड,
त्रिपुरी में खाना खाया, थोड़ा लिया चंद्रकला।
मन शिथिल हो उठा,
जब याद आई तेरी गलियां और अपना बहराइच।
यादें तुम्हारी हरे-भरे मांजुली सी हैं,
पन्ने मेरे सारे कोकोचोंग से फॉल हुए।
अभी पहुंचे ही थे हम आसाम,
कि रुक गई सिक्किमी वर्षा,
खत्म हो गई कड़क आसमी चाय,
लिखूंगा फिर कभी जब
और मिलेगी एक कप कड़क आसमी चाय।
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