गुरू महिमा का आपने व्यापक किया बखान
सर्व धर्म समभाव का दिया अनोखा ज्ञान,
बिन शिक्षा पाए कहीं, थे सद्गुण की खान,
सर्व सुधारक आपकी छवि थी बड़ी महान।
जिन कुरीतियों का जरा हुआ आपको भान,
वाणी से अपनी तुरंत, भृकुटि दी थी तान।
दिया ज्ञान जो आपने, समझ सके इंसान,
प्यार मोहब्बत से रहें हिन्दू मुसलमान।
मैं इतना ज्ञानी नहीं, जो कर सकूँ बखान,
नतमस्तक हो दे रहा, कोटि-कोटि सम्मान।
विकास मिश्र 'खुटार'
शाहजहांपुर
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