उससे ज्यादा 'उस' जैसा
दरवाज़ा अब भी वहीं है—
हल्का सा टेढ़ा
जिसे कभी ठीक
नहीं किया गया।
मैं अक्सर सोचता हूँ
क्या वो भी ऐसे ही चीज़ों
को अधूरा छोड़ देती है!
कमरे के भीतर सब कुछ
ज्यों का त्यों है
सिवाय उस वक़्त के
जो अब रुक गया है।
एक ख़ाली मग अब भी
खिड़की के पास रखा है
उसकी चाय की आख़िरी
चुस्की सूख चुकी है
पर होंठों का निशान
अब भी है—
जैसे किसी ने उसे
छुआ नहीं
बस देखने के लिए
रखा हो।
उसकी साड़ी का
एक टुकड़ा
अलमारी के हैंगर से
लटक रहा है
हवा नहीं चलती यहाँ
पर वो कभी-कभी
हिल जाता है—
जैसे कोई अधूरी विदाई
अब भी सवाल करती हो।
मैं रोज़ यहाँ आता हूँ
कुछ नहीं करता—
बस बैठा रहता हूँ
और एक-एक चीज़ से
माफ़ी माँगता हूँ।
उस कुर्सी से
जिस पर बैठकर
उसने मुझसे आँखें
नहीं मिलाईं थीं
उस दरवाज़े से
जो उसके जाते वक्त
ज़ोर से बंद हुआ था
उस आईने से
जिसमें उसकी आखिरी
झलक अब भी
जमी हुई है।
कभी-कभी लगता है
मैं इस कमरे में नहीं आता
बल्कि ये कमरा ही
हर रात मेरे भीतर
खुल जाता है।
मैं जहाँ भी जाऊँ
ये दीवारें मेरे साथ
चलती हैं—
एक अदृश्य बोझ
की तरह।
उसे अब शायद ये सब
याद भी न हो
पर मेरे लिए ये कमरा
उससे ज़्यादा
"उस" जैसा है।
क्योंकि वो बदल गई
पर इस कमरे ने
अब तक मुझे नहीं छोड़ा।
-विकास मानव