आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

उससे ज्यादा 'उस' जैसा

                
                                                         
                            उससे ज्यादा 'उस' जैसा
                                                                 
                            

दरवाज़ा अब भी वहीं है—
हल्का सा टेढ़ा
जिसे कभी ठीक
नहीं किया गया।
मैं अक्सर सोचता हूँ
क्या वो भी ऐसे ही चीज़ों
को अधूरा छोड़ देती है!

कमरे के भीतर सब कुछ
ज्यों का त्यों है
सिवाय उस वक़्त के
जो अब रुक गया है।
एक ख़ाली मग अब भी
खिड़की के पास रखा है
उसकी चाय की आख़िरी
चुस्की सूख चुकी है
पर होंठों का निशान
अब भी है—
जैसे किसी ने उसे
छुआ नहीं
बस देखने के लिए
रखा हो।

उसकी साड़ी का
एक टुकड़ा
अलमारी के हैंगर से
लटक रहा है
हवा नहीं चलती यहाँ
पर वो कभी-कभी
हिल जाता है—
जैसे कोई अधूरी विदाई
अब भी सवाल करती हो।

मैं रोज़ यहाँ आता हूँ
कुछ नहीं करता—
बस बैठा रहता हूँ
और एक-एक चीज़ से
माफ़ी माँगता हूँ।
उस कुर्सी से
जिस पर बैठकर
उसने मुझसे आँखें
नहीं मिलाईं थीं
उस दरवाज़े से
जो उसके जाते वक्त
ज़ोर से बंद हुआ था
उस आईने से
जिसमें उसकी आखिरी
झलक अब भी
जमी हुई है।

कभी-कभी लगता है
मैं इस कमरे में नहीं आता
बल्कि ये कमरा ही
हर रात मेरे भीतर
खुल जाता है।
मैं जहाँ भी जाऊँ
ये दीवारें मेरे साथ
चलती हैं—
एक अदृश्य बोझ
की तरह।

उसे अब शायद ये सब
याद भी न हो
पर मेरे लिए ये कमरा
उससे ज़्यादा
"उस" जैसा है।
क्योंकि वो बदल गई
पर इस कमरे ने
अब तक मुझे नहीं छोड़ा।
-विकास मानव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर