नभ से पतित
न था पतित
एकांत अचल
हिमशिखरों के
के तप से,
वो गिरा धरा पर
जा टप से
वर्णहीन
अब हो मलीन
वो तरल रूप
आकार हीन
गुण अवगुण
जब मिल जाते
विलग कठिन
वो हो पाते
अलग यदि जो
होना है
मुक्त 'स्वयं' से
होना है
नव जीवन का
बीज लिए
लय-सृजन का
बीज लिए
बूंद बूंद आशा
लेकर
चला अनंत
जिज्ञासा
लेकर
जब चंचल मन
उद्विग्न हुआ
फिर टिका नही,
कोई विघ्न हुआ
तट बंधो को जो
तोड़ रहा
वो स्वयं मार्ग को
मोड़ रहा
गली गली
कुल्याओं से
करता वो खेल
शिलाओं से
निकला वो प्रखर
उत्साहित हो
सबल बढ़ा वो
लक्षित हो
सूक्ष्म में है
विस्तार निहित
'ख' में ही
साकार निहित
विस्तार तो स्थिर
दिखता है
सूक्ष्म, क्षणमात्र न
टिकता है
निकल पड़ी
धाराएं जो
उपनद, नद की
शाखाएं जो
सींच रही
भू रंध्रो को
गातीं हैं
कलकल छंदों को
कल कल करती
कोलाहल हैं
पीती जो नित्य
हलाहल हैं
जल है जीवन
को देता है
जब, जैसा आकार
वो लेता है
हो त्रिसित वो
घट घट जाता है
घट घट की
प्यास बुझाता है
है विचित्र ये कैसी
आकुलता
किससे मिलने की
व्याकुलता
निज कर्मो में जो
खोता है
जल, मल भी तो
ढोता है
प्रारब्ध यदि जब
निश्चित हो
उपरम किस भांति
सुनिश्चित हो
स्मृति की मिट्टी
छोड़ चला
निर्मल था वो मल
ओढ़ चला
-विकास मोहन गुप्ता