विज्ञापन

कितना मुश्किल है मौला

vikas bajpai

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यादों की लाशों को ढोना कितना मुश्किल है मौला।
        
                                                    
                            
ख़ुद को थोड़ा थोड़ा खोना कितना मुश्किल है मौला।
प्यार वफ़ा ज़ज्बातों के जब सारे मोती बिखरे हों।
उन सबकी तस्बीह पिरोना कितना मुश्किल है मौला।
मसमूम हवाओं की हो जब साँसो पर पहरेदारी।
ख़ुशबू में रूमाल भिगोना कितना मुश्किल है मौला।
तकिये भीग गये हो जब आँखों के सैलाबों से।
फ़िर उन पर सिर रखकर सोना कितना मुश्किल है मौला।

-विकास कालाआमी
2 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all