यादों की लाशों को ढोना कितना मुश्किल है मौला।
ख़ुद को थोड़ा थोड़ा खोना कितना मुश्किल है मौला।
प्यार वफ़ा ज़ज्बातों के जब सारे मोती बिखरे हों।
उन सबकी तस्बीह पिरोना कितना मुश्किल है मौला।
मसमूम हवाओं की हो जब साँसो पर पहरेदारी।
ख़ुशबू में रूमाल भिगोना कितना मुश्किल है मौला।
तकिये भीग गये हो जब आँखों के सैलाबों से।
फ़िर उन पर सिर रखकर सोना कितना मुश्किल है मौला।
-विकास कालाआमी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X