गुरु केवल अक्षर नहीं,
जीवन पढ़ना सिखाता है,
गिरकर फिर से उठने का,
हौसला मन में जगाता है.
जिसने इंसान बना दिया,
उस गुरु को शत-शत नमन,
उसकी एक सीख से बनते,
देश के कितने उज्ज्वल जन.
कक्षा की चार दीवारों में,
केवल पाठ नहीं पलते हैं,
वहीं देश के भावी नेता,
वैज्ञानिक, सैनिक ढलते हैं.
शिक्षक चाहे तो पीढ़ी को,
नई दिशा दे सकता है,
एक दीपक लाखों दीपों को,
रोशन कर सकता है.
जिस गुरु ने गरीब बच्चे में,
प्रतिभा को पहचान लिया,
जिसने कमजोर हाथों में भी,
सपनों का आसमान दिया.
जिसने कहा, "तुम कर सकते हो",
वह गुरु महान है,
उसकी मेहनत से ही तो,
भारत की पहचान है.
पर शिक्षा जब दुकान बनी,
और ज्ञान हुआ सामान,
जब गुरु की कुर्सी बैठ गई,
केवल फीस की दुकान.
तब कहीं न कहीं मर जाता,
शिक्षा का पावन धर्म,
कागज पर विद्या रह जाती,
खो जाता उसका मर्म.
बच्चे को यदि ग्राहक समझा,
तो गुरुता कहाँ बची है?
हर सवाल की कीमत रख दी,
तो ममता कहाँ बची है?
ज्ञान बाँटना पुण्य था पहले,
अब सौदा क्यों होने लगा?
जिस मंदिर में दीप जलाना था,
वह बाजार क्यों होने लगा?
हे शिक्षक! धन कमाना गलत नहीं,
पर इतना याद रखिए,
जिस मन को आप गढ़ रहे हैं,
उसका सम्मान रखिए.
आपके शब्दों से बच्चे,
जीवन भर प्रभावित होंगे,
आज जिन्हें आप पढ़ाते हैं,
कल वही समाज चलाएँगे.
जो संस्कार आप देंगे उनको,
पीढ़ियाँ आगे ले जाएँगी,
आपकी बोली, आपकी करनी,
उनमें दिखाई दे जाएगी.
इसलिए हर पाठ पढ़ाने से,
पहले खुद उदाहरण बनिए,
बच्चों को उपदेश देने से पहले,
उनके आदर्श बनिए.
कल जब आपके पढ़े हुए बच्चे,
आपके सामने आएँगे,
तब वे केवल अंक नहीं,
आपके संस्कार बताएँगे.
तब न कोई फीस काम आएगी,
न कोई बड़ा सम्मान,
केवल यही पूछा जाएगा,
"आपने कैसा बनाया इंसान?"
इसलिए आज प्रणाम उन्हें,
जो शिक्षा को सेवा मानें,
बच्चों के उज्ज्वल भविष्य को,
अपना सच्चा धन जानें.
और उन गुरुजनों से विनती,
जो शिक्षा का व्यापार करें,
रुककर अपने अंतर्मन से,
एक बार अवश्य विचार करें.
क्योंकि शिक्षक केवल शिक्षक नहीं,
वह राष्ट्र का शिल्पकार है,
उसके हाथों में आने वाला,
भारत का पूरा संसार है.
सच्चे गुरु को कोटि नमन,
व्यापारी गुरु को प्यार भरी चेतावनी,
आज की आपकी कक्षा में बैठे बच्चे,
कल आपकी ही कहानी लिखेंगे.
शिक्षक दिवस पर सादर नमन.
- विजय शर्मा ऐरी