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ओस की बूंदे

VIBHA YADAV

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            थर्राती ठंड में कोहरे की चादर से लिपटी।
        
                                                    
                            
मुस्कुराती,गुनगुनाती,मधुर संगीत सुनाती।
अपने बजूद पर इठलाते,शर्माती सी हुई।
नाजुक कली सी,खिलने को हुई।
किसी राजकुमार से मिलने को आतुर,
जैसे प्रेयसी कोई सजी हुई।
ओस की बूंदे कुछ बनी हुई कुछ ठनी हुई।
3 वर्ष पहले
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Updesh Kumar

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