दर्द से पूछते हो क्यों
क्या दर्द है तुम्हें
बिखर जाओगे गर
एक भी टुकड़ा चुभ गया तुम्हें
शीशे की तड़फ न पूछना कभी
हजार टुकड़े होकर भी मरता नहीं
अक्स उसमें देखकर भी पूछते हैं उसी से
किसने और क्यों तोड़ा है तुम्हें/
जख्म भर जाते हैं चोट के
तकलीफ तो देता है वो सुकून
सुख की उम्मीद में जिसे खोजते हैं हम
नासूर बनकर वही छलता है तुम्हें /
नफरत मिली इस जहाँ से इतनी
जैसे सारी कायनात के जिम्मेदार थे हम
छीनकर अपने ही उम्र भर का सुख
पल भर में कर देते हैं तन्हा तुम्हें /
बेगुनाही की मिली सजा कुछ यूँ ताउम्र
गम का सिलसिला चला कुछ ऐसा
खुश हैं वही आज हमारी नादानी पर
समझे थे हम दर्द की दवा जिन्हें /
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।