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दर्द

                
                                                         
                            दर्द से पूछते हो क्यों
                                                                 
                            
क्या दर्द है तुम्हें
बिखर जाओगे गर
एक भी टुकड़ा चुभ गया तुम्हें

शीशे की तड़फ न पूछना कभी
हजार टुकड़े होकर भी मरता नहीं
अक्स उसमें देखकर भी पूछते हैं उसी से
किसने और क्यों तोड़ा है तुम्हें/

जख्म भर जाते हैं चोट के
तकलीफ तो देता है वो सुकून
सुख की उम्मीद में जिसे खोजते हैं हम
नासूर बनकर वही छलता है तुम्हें /

नफरत मिली इस जहाँ से इतनी
जैसे सारी कायनात के जिम्मेदार थे हम
छीनकर अपने ही उम्र भर का सुख
पल भर में कर देते हैं तन्हा तुम्हें /

बेगुनाही की मिली सजा कुछ यूँ ताउम्र
गम का सिलसिला चला कुछ ऐसा
खुश हैं वही आज हमारी नादानी पर
समझे थे हम दर्द की दवा जिन्हें /

वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़


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6 वर्ष पहले

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