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मेरे प्यारे श्री नाथ

Vandana Agrawal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सोचती हूं जब तुम्हें सोच कर
        
                                                    
                            
इतना अच्छा लगता है तो
मिलोगे तो क्या होगा
श्वांसे कह पाएंगी कुछ या
चली जाएंगी सदा के लिए हो रूष्ट।

बोलेंगी जिसकी प्रतिक्षा में
जगी रही आजीवन मैं श्रापित संताप।
जा रही अब संग उनके
मिल गए मुझे मेरे प्यारे श्री नाथ।

ठहर कर इस धरा पर
अब क्यों बोझ बढ़ाऊं
विरह वेदना की जलती अग्नि को
क्यों हृदय में अपने दहकाऊं?

बहुत बहाया पीर पराग
नैनों से सावन शीत की धार।
नाची पतझड़ पत्तों में बिखर कर खूब
पावन प्रीत के करुण क्रंदन में डूब।

अब तो आया है मधुमास मिलन का
मिला सौभाग्य प्रिय में विलय का ।
जिसके लिए की इतनी तपस्या, लेने वे आए हैं
वर्षों बाद आज मेरे प्रभु ने हृदय से मुझे लगाएं हैं ।
- वंदना अग्रवाल "निराली "
2 महीने पहले
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