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पर अब हार स्वीकार नहीं हमे।।।

Vaishanavi Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब दरिया में उतरे ,
        
                                                    
                            
तो पलटना मुमकिन न लगा।
धर्म के आगे कुछ न दिखा हमे,
किनारो पर रहना अब स्वीकार नहीं ,

स्वाभिमान से समझौता अब न मंजूर हमें,
क्योंकि अब हार स्वीकार नहीं हमे।
अब नहीं लौटेंगे बिन जीते हम
क्योंकि अब हार स्वीकार नहीं हमे।

जो स्वीकारे हार देव हम,
देना फिर आवाज तुम,
हम चाल फिर वही चलेंगे,
स्वाभिमान वही चुनेंगे
पर अब हार स्वीकार नहीं हमे।।।
एक घंटा पहले
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