किताब-ए-दिल
मुरादें अगर पूरी होतीं,
तो ये शिकवे अधूरे न होते...
कोई तो हसरत मेरी भी ना-तमाम रही होगी,
वर्ना यूँ ही हम इतने बुरे न होते।
खैर, रज़ामंदी तो मेरी भी थी
मेरी तबाही के अफ़साने में...
शिकवों का गिला मत पूछो हमसे,
ज़िंदगी गुज़र जाएगी दर्द सुनाने में।
कुछ पन्ने बचे हैं किताब-ए-दिल के,
लगा दो आग इन्हें भी, क्या रखा है बचाने में।