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लगा दो आग इन्हें भी, क्या रखा है बचाने में।

                
                                                         
                            किताब-ए-दिल
                                                                 
                            

मुरादें अगर पूरी होतीं,
तो ये शिकवे अधूरे न होते...

कोई तो हसरत मेरी भी ना-तमाम रही होगी,
वर्ना यूँ ही हम इतने बुरे न होते।

खैर, रज़ामंदी तो मेरी भी थी
मेरी तबाही के अफ़साने में...

शिकवों का गिला मत पूछो हमसे,
ज़िंदगी गुज़र जाएगी दर्द सुनाने में।

कुछ पन्ने बचे हैं किताब-ए-दिल के,
लगा दो आग इन्हें भी, क्या रखा है बचाने में।
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24 मिनट पहले

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