बाँस के खंभे में बचाकर रखते थे
एक-एक करके
हमारी छोटी-छोटी आकांक्षाओं की धात्विक ध्वनियाँ।
चाय-बागान की राह पर
शिरीष के पत्तों की नोक से
धूप की एक किरण उतरती थी
और धीरे-धीरे खो जाती थी
हरियाली की गहराई में।
गाड़ियाँ गुजरती रहती थीं,
धूल कुछ क्षणों के लिए
चारों ओर की हरियाली का रंग
मिटा देती थी।
हवा में दूर-दूर तक फैल जाती थी
पूजास्थल के ढाक की ध्वनि।
माँ के दोनों हाथों में समा जाते थे
हमारे छोटे-छोटे हाथ—
कुछ दूर पैदल,
कुछ दूर उसकी गोद में,
रास्ते की धूल पार करते
हम पूजा की ओर जाते थे।
हमारी निर्मल आँखों के आर-पार
रंग-बिरंगे गुब्बारे,
झिलमिलाते रोशनियों के बीच
एक क्षण के लिए
सारा संसार उजला कर देते थे।
उँगली से इशारा कर माँगते थे
यह, वह—न जाने कितना कुछ।
माँ ही जानती थी
कैसे जोड़ती थी
बाँस के खंभे में छिपी
उस कठिन बचत को।
अनजाने में माँ को दुख देता रहा
एक क्षणिक पानी के गुब्बारे के लिए।
तेरी छलछलाती आँखें
आज भी मेरा सीना जला देती हैं, माँ—
तेरे उस ऋण को
मैं कैसे चुका पाऊँगा?