विज्ञापन

मैल सब धोकर सच्ची इंसानियत अपनाना।

Utkarsh Somvanshi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आ गई दिवाली, आ गई दिवाली,
        
                                                    
                            
घर-घर में रौनक, चहुँओर खुशहाली।
चमका दिया हमने आँगन-कोना,
दीपों से सज गया कोना-कोना।

पर कितनी सफ़ाई मन के भीतर?
कितनी निर्मलता सोच के भीतर?
कितनों के मन का बैर मिटाया?
कितने ग़ैरों को गले लगाया?

कुछ रोज़ पहले रावण तो जलाया,
पर क्या भीतर का दानव मिटाया?
लोभ, घमंड और नफ़रत का अँधेरा,
क्या दिल से कभी हमने है खदेड़ा?

क्या मोल रहा फिर ऐसे त्योहारों का,
गर मर्म न समझा पावन संदेशों का?
न मन को बदला, न आदत छूटी,
बस रस्मों की इक डोर न टूटी।

आओ ज़रा ठहरें, सोचें और समझें हम,
अपने ही भीतर झाँककर देखें हम।
त्योहार महज़ एक शोर नहीं होता,
यह आत्मा का एक नया भोर होता।

इस बार एक दीप भीतर भी जलाना,
मैल सब धोकर सच्ची इंसानियत अपनाना।
22 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7573 कविताएं

View Profile