योग — तन से चेतन तक
योग अगर बस आसन होता,
तन तक आकर रुक जाता।
साँस न जुड़ती अंतर्मन से,
मन को कौन सँभाल पाता?॥
मौन साधते ऋषियों ने जब,
भीतर अपना सत्य था पाया।
श्वास, ध्यान और संयम जोड़कर,
जीने का विज्ञान बनाया॥
पतंजलि ने सूत्रों में बाँधा,
योग का दर्शन ज्ञान पुराना।
तन से मन, फिर मन से चेतन—
सीखा ख़ुद को स्वयं पहचानना॥
तन को साधे, मन को थामे,
श्वासों में संगीत जगाता।
ख़ुद से ख़ुद का मेल कराकर,
योग हमें संतुलन सिखाता॥
सूर्य नमस्कारों की लय से,
अंग-अंग में ऊर्जा आए।
ताड़ासन की सहज स्थिरता,
तन को संतुलन समझाए॥
वृक्षासन में तन जब ठहरे,
मन भी अपना केंद्र बनाए।
भुजंगासन की सहज गति से,
तन में लचक सहज बढ़ जाए॥
आसन केवल मोड़ नहीं तन,
तन की भाषा पढ़ना आता।
ख़ुद से ख़ुद का मेल कराकर,
योग हमें संतुलन सिखाता॥
साँस अगर बेचैन हुई तो,
मन भी उसके संग है भागे।
लय में आती श्वास जहाँ पर,
भीतर का सन्नाटा जागे॥
अनुलोम-विलोम की लय में,
श्वासों को विस्तार मिले।
भ्रामरी की गूँज के भीतर,
मन को सहज विराम मिले॥
साँसों पर जब ध्यान टिके तो,
मन भी धीरे थमना पाता।
ख़ुद से ख़ुद का मेल कराकर,
योग हमें संतुलन सिखाता॥
दौड़ रही दुनिया के पीछे,
मन भी हर दिन दौड़ रहा।
सुख-सुविधाएँ बढ़ती जातीं,
चैन कहीं पर छूट रहा॥
नींद, थकान और मन की उलझन,
जीवन की रफ़्तार बताए।
आसन, श्वसन और ध्यान की आदत,
दिनचर्या में लय ले आए॥
रोग मिटाने का दावा कैसा,
योग सजग जीवन अपनाता।
ख़ुद से ख़ुद का मेल कराकर,
योग हमें संतुलन सिखाता॥
बालक हो या उम्र ढली हो,
अपनी क्षमता साथ रखो।
जितना तन सहज स्वीकारे,
उतना ही अभ्यास रखो॥
योग नहीं प्रतियोगिता कोई,
किसने कितना तन झुकाया।
अपने कल से बेहतर होना—
योग ने यह दर्शन सिखाया॥
दूसरों से जीत नहीं यह,
ख़ुद पर अपना राज सिखाता।
ख़ुद से ख़ुद का मेल कराकर,
योग हमें संतुलन सिखाता॥
भारत की यह ज्ञान-धरोहर,
सीमाओं में बँध न पाई।
इक्कीस जून की विश्व-पुकार ने,
घर-घर योग की अलख जगाई॥
मुंबई की भोर हो चाहे,
एडिलेड की शाम सुहानी।
न्यूयॉर्क से लंदन तक पहुँची,
भारत की यह रीत पुरानी॥
देश बदलें, भाषा बदले,
योग सभी को पास है लाता।
ख़ुद से ख़ुद का मेल कराकर,
योग हमें संतुलन सिखाता॥
योग अगर बस काया होता,
काया के संग ढल जाता।
अगर महज़ व्यायाम ही होता,
मन को कैसे छू पाता?॥
योग तो अपने भीतर जाकर,
अपने होने को पहचानना।
हर आती-जाती साँस के संग,
जीवन का सम्मान जानना॥
तन की शक्ति, मन की शांति,
दोनों का यह मेल कराता।
ख़ुद से ख़ुद का मेल कराकर,
योग हमें संतुलन सिखाता॥
दुनिया जीती, शिखर भी जीते,
फिर भी मन क्यों हार रहा?
सब कुछ अपने वश में करके,
ख़ुद से क्यों इंसान पराया?॥
जीत बड़ी वह नहीं कि जग पर,
अपना तुम अधिकार जताओ।
जीत बड़ी है अपने मन को,
अपने अनुशासन में लाओ॥
भारत ने सदियों पहले ही,
जीवन का यह मर्म बताया।
ख़ुद से ख़ुद का मेल कराकर,
योग ने जग को राह दिखाया॥
— संतोष कुमार शर्मा