रणभेरी का शोर थम गया,
कलिंग युद्ध का दौर थम गया,
मौर्य ध्वजा तो जीत गई थी,
मन का सारा गर्व ढह गया।
जीत सामने खड़ी रही पर,
मन क्यों इतना मौन हुआ—
राज्य युद्ध से जीत लिया,
मन पर धम्म का राज हुआ॥
धरती रक्त से लाल पड़ी थी,
लाशों की इक पाँत पड़ी थी,
कहीं पिता था, कहीं पुत्र था,
कहीं सुहाग की राख पड़ी थी।
जिस विजय पर गर्व था कल तक,
आज वही संताप हुआ—
राज्य युद्ध से जीत लिया,
मन पर धम्म का राज हुआ॥
कोई माँ बेटे को ढूँढ़े,
कोई पत्नी पति को ढूँढ़े,
कोई बच्चा शव से लिपटा,
अपनों में अपना घर ढूँढ़े।
सम्राट खड़ा था मौन वहाँ पर,
राजमुकुट भी भार हुआ—
राज्य युद्ध से जीत लिया,
मन पर धम्म का राज हुआ॥
“जीता क्या है मैंने आखिर?”
प्रश्न उठा सम्राट के भीतर,
“भूमि मिली तो क्या पाया है,
जब उजड़े हैं इतने ही घर?”
पहली बार विजेता के मन,
अपनी जीत से प्रश्न हुआ—
राज्य युद्ध से जीत लिया,
मन पर धम्म का राज हुआ॥
तलवारों ने सीमा जीती,
लेकिन किसने पीड़ा जीती?
भय से मस्तक झुक जाते हैं,
कब तलवारों ने मन जीती?
शस्त्रों पर विश्वास घटा तो,
करुणा पर विश्वास हुआ—
राज्य युद्ध से जीत लिया,
मन पर धम्म का राज हुआ॥
जिस अशोक से रण डरता था,
अब वह अपने मन से लड़ता था,
कितने शव की नींव पे आखिर,
एक विजय का महल खड़ा था?
कल तक जो था युद्ध-विजेता,
आज स्वयं से युद्ध हुआ—
राज्य युद्ध से जीत लिया,
मन पर धम्म का राज हुआ॥
अब विजय का अर्थ नया था,
अब शासन का धर्म नया था,
प्राण हर लेना वीरता नहीं—
प्राण बचाना कर्म नया था।
भेरी का वह घोष थमा तो,
धम्म-घोष का नाद हुआ—
राज्य युद्ध से जीत लिया,
मन पर धम्म का राज हुआ॥
पत्थर पर संदेश उकेरे,
करुणा के उपदेश उकेरे,
दया, अहिंसा, जीव-कल्याण के,
जन-जन हेतु संदेश उकेरे।
राजा केवल शासक न था अब,
जन-हित उसका काज हुआ—
राज्य युद्ध से जीत लिया,
मन पर धम्म का राज हुआ॥
जीत वही जो द्वेष मिटाए,
टूटे मन को फिर अपनाए,
जिस विजय से घर उजड़ें हों,
वह कैसी विजय कहलाए?
सबसे कठिन विजय है जिसमें,
अपने अहम् का त्याग हुआ—
राज्य युद्ध से जीत लिया,
मन पर धम्म का राज हुआ॥
कलिंग हारा—जग ने देखा,
पर उस दिन इतिहास ने देखा,
भूमि अशोक ने जीत ली थी,
करुणा ने सम्राट को जीता।
एक विजय तलवार से पाई,
एक विजय में त्याग हुआ—
राज्य युद्ध से जीत लिया,
मन पर धम्म का राज हुआ॥
— संतोष कुमार शर्मा