हर एक दर्द को अपना बना के रक्खा है
ये अपने आप को कैसा बना के रक्खा है
किसी ने हुस्न से आगे उसे नहीं देखा
सभी ने चाँद का टुकड़ा बना के रक्खा है
बड़े सुकून से वो सो रही है और उस ने
हमारे हाथ को तकिया बना के रक्खा है
मैं टूट जाऊँगा पत्थर न मारना मुझ को
तुम्हारे प्यार ने शीशा बना के रक्खा है
तुम्हारी ज़ुल्फ़ को हाथों से मैं सँवारूँगा
इसी ख़याल को सपना बना के रक्खा है
~ यश त्रिवेदी
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