तुम साथ रहीं तो…
मैं दुनिया के आगे हँसता रहा, तुम दर्द मेरा पढ़ती रहीं,
मैं लफ़्ज़ों में कुछ कह न सका, तुम ख़ामोशी को सुनती रहीं।
जब जीत मिली, मैं आगे था, तुम पीछे रहकर मुस्काईं,
जब हार ने मुझको घेर लिया, तुम ढाल बनाकर खड़ी रहीं।
मैं धूप भरी राहों पर चला, तुम छाँव बिछाती साथ रहीं,
जब पाँव थके, रफ़्तार घटी, तुम हौसला बनकर साथ चलीं।
मैं अपने सपनों में उलझा, तुम घर के सपने बुनती रहीं,
मैं आने वाला कल लिखता, तुम आज सँवारती साथ रहीं।
दो नन्हे हाथ जब घर आए, तुमने खुद को उनमें बाँट दिया,
मैं पिता बनकर इतराता था, तुम माँ बन जीवन जीती रहीं।
कभी मेरी बात तुम्हें चुभी, कभी बात तुम्हारी भारी थी,
पर रात अगर रूठे गुज़री, तुम सुबह प्यार से मिलती रहीं।
मेरी कमियाँ मुझसे छिपी रहीं, तुमने हर कमी पहचान भी ली,
दुनिया मुझमें दोष गिनाती रही, तुम अच्छाई मेरी चुनती रहीं।
जब जेब में साधन कम थे, पर आँखों में सपने भारी थे,
मैं सोच रहा था—“कैसे होगा?”, तुम कहती रहीं—“हम साथी हैं।”
कभी वक़्त ने हमको फूल दिए, कभी काँटों पर चलना पड़ा,
मैं मौसम से लड़ता रह गया, तुम हर मौसम में साथ रहीं।
अब वक़्त ने चेहरे पर धीरे, कुछ अपनी रेखाएँ लिख दी हैं,
मैं उम्र के पन्ने गिनता हूँ, तुम पहली चाहत बनी रहीं।
कल बच्चे अपनी राह चलें, और घर कुछ खाली हो जाए,
उस सूनी होती शाम में भी, तुम मेरा घर बन साथ रहो।
मैं मंदिर-मंदिर क्या माँगूँ, जब घर में दुआ-सी रहती हो,
मेरे हिस्से की हर नेमत में, सबसे सुंदर नेमत तुम हो।
यदि रब पूछे इस जीवन में, सबसे अनमोल मिला क्या है,
मैं बिना रुके बस कह दूँगा—मेरी सबसे सुंदर सौग़ात तुम हो।
न दौलत माँगूँ, न शोहरत, बस एक दुआ स्वीकार रहे,
जब आख़िरी राह पे चलना हो, हाथों में अपना हाथ रहे।
— संतोष कुमार शर्मा