ठान लिया
ज्ञान लिए आचार्य खड़ा था,
राजसभा ने मान न जाना,
सत्ता अपने मद में डूबी,
विद्वत्ता का मोल न माना।
भरी सभा में अपमान मिला तो,
अब सामर्थ्य दिखलाना है,
ठान लिया, अब ठान लिया है,
इतिहास नया रच जाना है।
शिखा खुली तो प्रण भी जागा,
मन में दृढ़ संकल्प जगा,
न सेना थी, न सिंहासन था,
बुद्धि का बस दीप जला।
क्रोध नहीं, अब कर्म पथ पर,
अपना मान बनाना है,
ठान लिया, अब ठान लिया है,
इतिहास नया रच जाना है।
एक बालक में तेज़ था देखा,
भावी सम्राट का आधार,
चंद्रगुप्त को साथ लिया फिर,
ज्ञान बना उसका हथियार।
पत्थर में सम्राट छिपा था,
उसको आज तराशना है,
ठान लिया, अब ठान लिया है,
इतिहास नया रच जाना है।
राजनीति का मर्म सिखाया,
युद्ध-कला का ज्ञान दिया,
पहली हार से पाठ लिया फिर,
नई नीति को मान दिया।
हार मिली तो रुकना कैसा,
फिर से कदम बढ़ाना है,
ठान लिया, अब ठान लिया है,
इतिहास नया रच जाना है।
सीमा से अभियान बढ़ाया,
धीरे-धीरे मान बढ़ा,
नंद-सिंहासन अंततः टूटा,
मौर्य-ध्वज सम्मान से चढ़ा।
जिस दरबार ने मान न जाना,
उसको सत्य दिखाना है,
ठान लिया, अब ठान लिया है,
इतिहास नया रच जाना है।
अपमानों का उत्तर केवल,
शब्दों में प्रतिकार नहीं,
कर्म स्वयं पहचान बनें जब,
उससे बढ़कर वार नहीं।
ठोकर को सोपान बनाकर,
अपना पथ खुद पाना है,
ठान लिया, अब ठान लिया है,
इतिहास नया रच जाना है।
चाणक्य केवल नाम नहीं है,
दृढ़ संकल्प की अमर कहानी,
ज्ञान अगर पुरुषार्थ से जुड़ जाए,
बदल सके तकदीर पुरानी।
किसने तुमको कम आँका था,
यह सोच समय गँवाना क्या है,
ठान लिया, अब ठान लिया है,
इतिहास नया रच जाना है।
— संतोष कुमार शर्मा