सीता समाईं, राम पुकारें
सभा जुड़ी थी, सीता आईं,
दोनों सुत थे साथ खड़े।
राम निहारें उन चेहरों को,
नयनों में स्नेह उमड़ पड़े।
लव-कुश को पास बुलाकर,
राम भुजाएँ खोल रहे थे।
पुत्रों में वैदेही की छवि,
भीगे नयन सँजो रहे थे।
ऋषि वाल्मीकि उठकर बोले,
तप का अपना साक्ष्य दिया।
सीता की निर्मल निष्ठा का,
सबको सत्य प्रमाण दिया।
सिर ऊँचा था, नयन सजल,
मुख पर गहरी शांति रही।
राम बसे थे अंतर्मन में,
अविचल उनकी प्रीति रही।
वन-पथ हो या राजमहल,
एक समर्पण साथ रहा।
सुख-दुख ने परिवेश बदले,
मन में उनका प्रेम रहा।
कर जोड़कर खड़ीं जानकी,
धरती माँ का ध्यान किया।
मन-वचन-कर्म की निष्ठा से,
अपना सत्य निवेदन किया।
धरती की गोद में वैदेही,
माँ ने बेटी को अपनाया।
जिन चरणों ने वन-पथ नापे,
उनको अपने अंक बिठाया।
माँ को जाते देख लव-कुश,
नन्हे हाथ रहे फैलाए।
एक झलक की आस लिए,
माँ से दृष्टि हटा न पाए।
सीता समाईं, राम पुकारें,
स्वर करुणा से भर गए।
जिस माटी ने उन्हें समेटा,
उस पर आँसू बिखर गए।
सीता का मौन, राम की पुकार,
दोनों में बस प्यार रहा।
विधि के लिखे वियोग में भी,
एक अटूट विश्वास रहा।
राम के नयनों में सीता,
बाँहों में सुत सिमट गए।
माँ की स्मृति थामे तीनों,
एक-दूजे का दुःख सह गए।
विधि ने लिखी कठिन विदाई,
मन के बंधन टूट न पाए।
सीता जब धरती में समाईं,
राम भी अश्रु रोक न पाए।
— संतोष कुमार शर्मा