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शबरी के बेर

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बरसों पथ को बुहार रही थी,
        
                                                    
                            
मन में राम निहार रही थी,
आएँगे प्रभु एक दिवस तो—
इस विश्वास में जी रही थी।
उम्र ढली, विश्वास न हारा,
राम-नाम ही श्वास रहा—
प्रेम जहाँ निष्काम रहा,
वहाँ प्रभु का वास रहा॥

वन से चुनकर बेर वो लाती,
एक-एक को चखती जाती,
खट्टा बेर अलग कर देती,
मीठा प्रभु के लिए बचाती।
फल छोटा था, भाव बड़ा था,
मन में बस उल्लास रहा—
प्रेम जहाँ निष्काम रहा,
वहाँ प्रभु का वास रहा॥

राम पधारे द्वार शबरी के,
खुल गए भाग्य उस कुटिया के,
काँप रहे थे हाथ खुशी से,
भर आए थे नयन भक्ति से।
जिसकी राह में उम्र बिताई,
आज वही विश्वास रहा—
प्रेम जहाँ निष्काम रहा,
वहाँ प्रभु का वास रहा॥

चख-चख बेर प्रभु को देती,
मुख की ओर निहारती रहती,
मेरे राम को खट्टा न मिले—
बस इतनी-सी चिंता रहती।
प्रभु ने फल का स्वाद न देखा,
भक्ति का ही स्वाद रहा—
प्रेम जहाँ निष्काम रहा,
वहाँ प्रभु का वास रहा॥

लक्ष्मण ने मर्यादा देखी,
राम ने निर्मल ममता देखी,
जिसको जग ने जूठा समझा,
प्रभु ने उसमें श्रद्धा देखी।
एक ओर था नियम जगत का,
एक ओर विश्वास रहा—
प्रेम जहाँ निष्काम रहा,
वहाँ प्रभु का वास रहा॥

लोककथा यह बात सुनाती,
पीढ़ी-पीढ़ी सीख सिखाती,
जिन बेरों को तुच्छ समझकर,
धरती पर था फेंका जाता।
ठुकराया जो भाव कभी था,
धरती के ही पास रहा—
प्रेम जहाँ निष्काम रहा,
वहाँ प्रभु का वास रहा॥

जब लक्ष्मण पर संकट आया,
प्राणों पर था तम-सा छाया,
संजीवनी की खोज में हनुमत,
पूरा पर्वत उठा के लाए।
लोक कहे—उस औषधि में भी,
शबरी-प्रेम का अंश रहा—
प्रेम जहाँ निष्काम रहा,
वहाँ प्रभु का वास रहा॥

जिसको छोटा मान रहे हो,
शायद उसको जान न रहे हो,
किसके भीतर कौन-सा हीरा—
बाहर से पहचान न रहे हो।
मान मिला जब भाव हृदय को,
जीवन का संदेश रहा—
प्रेम जहाँ निष्काम रहा,
वहाँ प्रभु का वास रहा॥

धन से पूजा पूर्ण न होती,
वैभव से भक्ति नहीं होती,
मन में यदि अपनापन न हो तो,
अर्पण में भी शक्ति न होती।
मुट्ठी भर वे बेर थे लेकिन,
उनमें पूरा प्यार रहा—
प्रेम जहाँ निष्काम रहा,
वहाँ प्रभु का वास रहा॥

शबरी केवल कथा नहीं है,
भक्ति कोई प्रथा नहीं है,
जो कुछ अपना है, प्रेम से देना—
इससे बड़ी आराधना नहीं है।
राम को फल की भूख कहाँ थी,
भावों का स्वीकार रहा—
प्रेम जहाँ निष्काम रहा,
वहाँ प्रभु का वास रहा॥

— संतोष कुमार शर्मा
11 घंटे पहले
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