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अरे, सुन रही है तो मुझको बता दे

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अन्तिम विदाई की घड़ी आ पहुँची,
        
                                                    
                            
श्मशान घाट में जा पहुँची।
चिता पर शैय्या बिछने लगी,
मैं रो-रोकर हँसने लगी।

यह कैसी अन्तिम विदाई है,
क्यों मिलने न तू आई है?
मेरी पीड़ा न जान सकी,
जिसके संग वर्षों प्रीत निभी।

तन को बनाया शव मैंने,
मन को काठ बनाया।
जाति-समाज का लिया सहारा,
पवन ने दाह बढ़ाया।

अपने ही ‘मैं’ की अग्नि से
चिता में आग लगाई।
क्षण भर में सब दहन हुआ,
और केवल राख बचाई।

राख बनकर बची हैं केवल
उसकी सारी यादें।

अरे, सुन रही है तो मुझको बता दे—
राख बहा दूँ गंगा में,
या अपने पास संभालूँ?
-नवीन कमल
4 घंटे पहले
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