विज्ञापन

मेरी बेटी अगर बेटा होती

User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उसके जन्म पर बाँटी जातीं कुछ और मिठाइयाँ,
        
                                                    
                            
मिलतीं मुझे थोड़ी और ज़्यादा बधाइयाँ।
गाए जाते छठी के गीत और बाँटे जाते उपहार,
बुलाए जाते घर पर सब दोस्त और रिश्तेदार।

नहीं बोला जाता कि पहली बेटी बेटे जैसी होती है,
बेटियाँ तो अपनी किस्मत अपने साथ लेकर आती हैं।
आँधी आई है तो कभी बारिश भी होगी,
चिंता न कर, लक्ष्मी आई है तो बरकत भी होगी।

पर मेरा क्या होता अगर मेरी बेटी बेटा होती?
इतनी रंग-बिरंगी पोशाकें मैं किसके लिए खरीदती?
इतनी प्यारी-प्यारी रबर और पिन किसके लिए लाती?
जैसे इसको सजाती हूँ, क्या लड़के को भी सजा पाती?

पहना देती हूँ इसको कुर्ता-पजामा, उसको लहंगा कैसे पहनाती?
इसको तो कान्हा भी बनाया है मैंने, उसको राधा कैसे बनाती?
ले आती हूँ इसके लिए ट्रैक्टर और गाड़ी भी, पर उसके लिए गुड़िया कैसे लाती?
बाँध देती हूँ इसको कलावा भी, उसको चूड़ियाँ कैसे पहनाती?

कभी-कभी लगता है मेरी भी सोच पुरानी है,
लड़की है, एक दिन तो परायी हो ही जानी है।
इसलिए चुपके से लुटा जाती हूँ बेटे से ज़्यादा प्यार,
सीने से लगाकर रखती हूँ, करती हूँ बहुत दुलार।

मेरी बेटी अगर बेटा होती, तो क्या सच में कुछ और होती?
या फिर मेरी सोच ही होती, जो बेटे-बेटी में फ़र्क करती?
बेटियों की तुलना बेटे से करना बिल्कुल गलत है,
एक को दूसरे से कम आँकना कहाँ उचित है?
— पूजा शर्मा
एक घंटा पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all