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मजदूरों पर कविता

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            धूप वृष्टि ताप शीत ,वक्ष स्वेद से सजा है
        
                                                    
                            
पेट पालने के लिए घर से जो दूर हैं
बड़ी–बड़ी इमारत महलों को है बनाते
रहने को झोपड़ी में वह मजबूर है
मालिकों के कटु शब्द सहते रहे है किंतु
देश विकास में योगदान भरपूर है
स्वेद धूल से सने हुए जो काम करते है
नमन इन्हे है ये महान मजदूर हैं||
-मानस मनीष
 
2 महीने पहले
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