'मैं' और 'तुम' करते-करते,
कितने हुए तितर-बितर।
राह भी यक्सा नहीं,
कोई इधर तो कोई उधर।
'मैं' और 'तुम' को तजकर
चलो 'हम' एक होकर,
चलो कुछ कर गुजरते हैं,
चलो 'हम' एक होकर।
भिज्ञ हैं मार्ग में रोड़े
बहुत ही दुर्दांत हैं।
इनको हम दूर करेंगे
मैं, तुम, और हम साथ मिलकर।
-तुफैल अहमद 'चाहत'