तुम्हारे तने से लिपटकर
एक पीपल ने
अपना छोटा-सा घर बनाया है—
जैसे किसी पुराने रिश्ते की
दरार में
अचानक उग आया हो विश्वास।
न उसने तुमसे पूछा
कि तुम्हारी जाति क्या है,
न तुमने उससे पूछा
कि उसकी जड़ें कहाँ की हैं—
बस पत्तियों ने
एक-दूसरे की भाषा समझ ली।
तुम चुप खड़े रहे,
वह तुम्हारे कंधे पर
अपना आकाश टाँगता रहा।
धीरे-धीरे उसकी जड़ें
तुम्हारी देह में उतरती गईं,
और तुम्हारी छाल
उसके बचपन को थामती रही।
लोग कहते हैं—
पीपल बड़ा होकर
तुम्हें निगल जाएगा;
पर पेड़ शायद
निगलना नहीं जानते,
वे तो बस
एक-दूसरे में
जगह बनाना जानते हैं।
तुम दोनों को देखकर
आज लगा—
रिश्ते रक्त से नहीं,
सहारे से भी बनते हैं।
एक जड़ धरती में है,
दूसरी तुम्हारे भीतर—
और दोनों मिलकर
एक ऐसा वृक्ष रच रही हैं
जिसकी छाँव में
शायद मनुष्य
अपना बँटवारा भूल सके।
-आलोक प्रकाश