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कम्बल ओढ़े बाबा नीब करौरी

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कम्बल ओढ़े बाबा नीब करौरी (भक्तिगीत)
        
                                                    
                            

कम्बल ओढ़े नीब करौरी,
आँखों में विश्वास लिए,
साधारण-सी देह में बैठे,
हनुमत का प्रकाश लिए।
एक नज़र जिस मन पर डाली,
व्याकुल मन विश्राम हुआ—
प्रेम जहाँ निष्काम हुआ,
वहीं बाबा का धाम हुआ॥

राम-नाम हर श्वास बना था,
हनुमत उनका ध्यान बना,
भक्तों की श्रद्धा में बाबा,
अंशावतार महान बना।
स्वयं रहे हर यश से पीछे,
सेवा ही सम्मान हुआ—
प्रेम जहाँ निष्काम हुआ,
वहीं बाबा का धाम हुआ॥

भूखे को भोजन मिल जाए,
इतनी उनकी चाह रही,
दुखते मन को सुख मिल जाए,
इतनी सी ही राह रही।
रोटी उनके हाथों पाकर,
भोजन भी भगवान हुआ—
प्रेम जहाँ निष्काम हुआ,
वहीं बाबा का धाम हुआ॥

राजा आया, रंक भी आया,
सबको एक सम्मान मिला,
जाति, देश, पद, नाम भुलाकर,
हर मानव को स्थान मिला।
भेद मिटे उस दृष्टि तले तो,
हर मानव भगवान हुआ—
प्रेम जहाँ निष्काम हुआ,
वहीं बाबा का धाम हुआ॥

कैंची की दो पर्वत-बाहें,
पावन द्वार सजाती हैं,
वन की शीतल मौन हवाएँ,
राम-सुगंध बहाती हैं।
नैनीताल के निकट जहाँ पर,
कोलाहल भी विराम हुआ—
प्रेम जहाँ निष्काम हुआ,
वहीं बाबा का धाम हुआ॥

हनुमान की मूर्ति के आगे,
चंचल मन थम जाता है,
बाबा के पावन प्रांगण में,
अंतरदीप जग जाता है।
कैंची धाम की नीरवता में,
मन का हर संग्राम शांत हुआ—
प्रेम जहाँ निष्काम हुआ,
वहीं बाबा का धाम हुआ॥

चमत्कार पीछे चलते थे,
बाबा आगे जाते थे,
“सब उपलब्धि हनुमत की है,”
इतना ही बतलाते थे।
उनके सम्मुख “मैं” जब पिघला,
हर कर्ता श्रीराम हुआ—
प्रेम जहाँ निष्काम हुआ,
वहीं बाबा का धाम हुआ॥

सात समंदर पार बसे मन,
उनके द्वार पर आते थे,
जग के ऊँचे शिखर चढ़े पर,
अंतर-पथ न पाते थे।
कम्बल वाली छाँव मिली तो,
हर अहंकार गुमनाम हुआ—
प्रेम जहाँ निष्काम हुआ,
वहीं बाबा का धाम हुआ॥

वृंदावन की पावन रज ने,
बाबा को विश्राम दिया,
समाधि की मौन शांति ने,
विरह को भी प्रणाम दिया।
देह से आगे बढ़कर उनका,
कण-कण में विस्तार हुआ—
प्रेम जहाँ निष्काम हुआ,
वहीं बाबा का धाम हुआ॥

मंदिर केवल पत्थर न हो,
सेवा का संकल्प बने,
माला केवल नाम न जपे,
दुखियों का अवलंब बने।
बाबा का पथ तभी मिलेगा,
जब जीवन उपकार हुआ—
प्रेम जहाँ निष्काम हुआ,
वहीं बाबा का धाम हुआ॥

कम्बल अब भी यही बताता—
संचय कोई सार नहीं,
भूखा सोए द्वार किसी के,
यह हनुमत-व्यवहार नहीं।
जिसने सबमें राम को देखा,
उसका जीवन राम हुआ—
प्रेम जहाँ निष्काम हुआ,
वहीं बाबा का धाम हुआ॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
7 घंटे पहले
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