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काश मैं भी सेलिब्रिटी हो जाऊँ

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            काश मैं भी सेलिब्रिटी हो जाऊँ
        
                                                    
                            

काश
मैं भी
सेलिब्रिटी हो जाऊँ।
फिर मुझे
किसी विषय का ज्ञान हो न हो—
हर विषय पर
मेरी राय पूछी जाएगी।

देश।
समाज।
शिक्षा।
अर्थव्यवस्था।
प्रेम।
परिवार।
बस कैमरा सामने हो,
मैं गंभीर चेहरा बनाकर कह दूँगा—

“हमें इस पर
गहराई से सोचने की ज़रूरत है।”

लोग मान लेंगे
कि मैंने सोच भी लिया।
फिर मैं
फीता काटूँगा।

अस्पताल का।
विद्यालय का।
दुकान का।
यहाँ तक कि
उस पुस्तक का भी—
जिसे पढ़ने का समय
मेरे पास कभी नहीं होगा।
मेरे आने से पहले
सड़क साफ होगी।

दरवाज़े खुलेंगे।
कुर्सियाँ लगेंगी।
भीड़ रोकी जाएगी।

जो लोग
दो घंटे से पंक्ति में खड़े होंगे,
उन्हें बताया जाएगा—

“ज़रा रुकिए,
विशिष्ट अतिथि आ रहे हैं।”
मैं देर से पहुँचूँगा।

फिर भी
कार्यक्रम मेरे आने पर ही
आरम्भ माना जाएगा।
मंच पर
मेरे नाम से पहले
इतने विशेषण लगाए जाएँगे
कि थोड़ी देर के लिए
मैं स्वयं भी भूल जाऊँगा—
मेरा असली नाम क्या है।
पुरस्कार भी मिलेंगे।

कभी अभिनय के लिए।
कभी समाजसेवा के लिए।
कभी केवल पहुँच जाने के लिए।

मेरे काम से पहले
मेरी उपस्थिति तय होगी—
फिर आयोजक यह सोचेंगे
कि मुझे सम्मान किस बात का देना है।
समाजसेवा भी करूँगा।

कंबल बाँटूँगा।
पौधा लगाऊँगा।
किसी बच्चे को पुस्तक दूँगा।

बस उससे पहले
प्रकाश सही होना चाहिए,
कैमरा तैयार होना चाहिए
और मेरी करुणा का
सही कोण दिखाई देना चाहिए।
क्योंकि प्रसिद्धि के संसार में
भलाई करना पर्याप्त नहीं—
भलाई करते हुए दिखाई देना भी ज़रूरी है।
लोग मेरे साथ
तस्वीर खिंचवाएँगे।

कुछ मुझे पसंद करेंगे।
कुछ तस्वीर को।
कुछ केवल यह सिद्ध करना चाहेंगे
कि वे भी
किसी प्रसिद्ध आदमी को जानते हैं।
हाथ हिलाऊँगा।
मुसकराऊँगा।
आशीर्वाद दूँगा।

और अगले ही क्षण
अपने सहायक से पूछूँगा—

“ये थे कौन?”
मेरे पीछे
प्रशंसकों की भीड़ होगी।

लाइक।
कमेंट।
शेयर।
फॉलोअर।

कुछ असली।
कुछ खरीदे हुए।
कुछ ऐसे—
जिन्हें यह भी नहीं मालूम
कि वे मुझे क्यों चाहते हैं।
मेरी हर छींक पर
हज़ारों प्रतिक्रियाएँ आएँगी।

कोई कहेगा—
“सर, अपना ध्यान रखिए।”

कोई लिखेगा—
“सब दिखावा है।”

और कोई
मेरी छींक में भी
देश के विरुद्ध षड्यंत्र खोज लेगा।
मैं चाय पीऊँगा—
समाचार बन जाएगा।

जूते पहनूँगा—
फैशन बन जाएगा।

मंदिर जाऊँगा—
आस्था पर बहस होगी।

छुट्टी मनाऊँगा—
देशभक्ति पर प्रश्न होगा।
मैं जो करूँगा,
उसका अर्थ
मुझसे अधिक
दूसरे लोग तय करेंगे।
फिर कंपनियाँ आएँगी।

कपड़े पहनाएँगी।
घड़ी बाँधेंगी।
साबुन थमाएँगी।
मुसकराना सिखाएँगी।

मैं कैमरे के सामने कहूँगा—

“मैं वर्षों से
यही इस्तेमाल करता हूँ।”

और कैमरा बंद होते ही पूछूँगा—

“यह चीज़
आख़िर है क्या?”
मेरे शब्द भी
दूसरे लिखेंगे।

भाषण किसी का।
विचार किसी के।
पोस्ट किसी की।

बस नीचे
मेरा नाम होगा—
और ऊपर
मेरी मुसकान।
मेरे जन्मदिन पर
हज़ारों संदेश आएँगे।

मेरी मेज़ पर
सैकड़ों फूल होंगे।

केक बड़ा होगा।
कमरा भरा होगा।

बस यह समझना कठिन होगा—
इनमें अपना कौन है
और अवसर देखकर आया कौन।
ब्लू टिक होगा।
काली गाड़ी होगी।
आगे सुरक्षा होगी।
पीछे कैमरे होंगे।

भीड़ मुझे देखकर
रास्ता छोड़ देगी।

और धीरे-धीरे
वे पुराने मित्र भी
रास्ता बदल देंगे—
जिनके साथ कभी
मैं बिना पहचान के
खुलकर हँसा करता था।
घर से निकलूँगा
तो कैमरा।

हवाई अड्डे पर
कैमरा।

रेस्तराँ में
कैमरा।

परिवार के साथ
कैमरा।

मैं दुनिया के सामने रहूँगा—
बस अपने घर में
अकेला नहीं रह पाऊँगा।
मेरे चेहरे पर मुसकान न हो
तो लोग लिखेंगे—

“घमंड आ गया है।”

ज़्यादा मुसकरा दूँ
तो कहेंगे—

“सब प्रचार है।”
एक दिन
आईने के सामने खड़ा होकर
मैं अपनी स्वाभाविक मुसकान खोजूँगा।

मगर चेहरे पर
वही अभ्यास किया हुआ भाव मिलेगा
जो मेरी जनसंपर्क टीम ने
मेरे लिए चुना होगा।
तब याद आएगा—

कभी मैं
बिना अनुमति हँस सकता था।

बिना समाचार बने रो सकता था।

बिना छिपे सड़क पर चल सकता था।

बिना सोचे किसी मित्र को फोन कर सकता था।
तब कोई अंगरक्षक नहीं था—
पर भय भी नहीं था।

कोई प्रशंसक नहीं था—
पर कुछ अपने थे।

कोई ब्लू टिक नहीं था—
पर मेरी पहचान
मेरे भीतर सुरक्षित थी।
प्रसिद्धि के बदले
मैंने अपनी निजता दी।

तालियों के बदले
अपना मौन।

भीड़ के बदले
कुछ सच्चे रिश्ते।

सही दिखने की चिंता में
गलत होने का अधिकार।

और सबकी नज़रों में रहने के लिए
अपने साथ बिताया जाने वाला समय।
मैंने खो दिया—

बिना कारण बाहर निकलना।
सड़क किनारे चाय पीना।
पुराने मित्र से बेझिझक लड़ना।
परिवार के साथ बिना कैमरे के हँसना।
और किसी साधारण दिन को
साधारण ही रहने देना।
काश
मैं भी
एक सेलिब्रिटी हो जाऊँ—

यह सपना
शायद तब तक सुंदर है
जब तक दूर से दिखाई देता है।
क्योंकि प्रसिद्ध होने की दौड़ में
दुनिया आदमी का नाम याद कर लेती है—
पर कई बार
वह आदमी स्वयं को भूल जाता है।
आख़िर मैंने पाया क्या?

एक नाम—
जिसे पूरा संसार पुकारता था।

और खोया क्या?

वह आदमी—
जो कभी उस नाम को सुनकर
भीतर से उत्तर दिया करता था।
— संतोष कुमार शर्मा
 
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