जब मेरा चीर हरण को था,
जब सत को पाप वरण को था,
क्या तब कुंजन की सैर करी,
क्यू माधव तुमने देर करी?
जब पाप सभा मे बात चली,
नारी निजता पर घात् चली,
जब शकुनि ने पासे बाटे,
वो हाथ तभी क्यूं नाकाटे?
जब खींच मुझे वो लाया था,
आर्यों को दास बताया था।
जब प्राण मेरे अति त्रस्त् रहे,
क्या राज काज मे व्यस्त रहे?
जब शासक नज़र झुकाये थे,
जब योद्धा नाक कटाये थे,
जब सभा मध्य ना राम कोई,
था बहुत जरूरी काम कोई?
जब दुष्ट दुशासन टूटा था,
जब पाप पुण्य को लूटा था,
क्यूं अंतिम अश्रु बाट करे,
क्या पहला रुंदन झूठा था?
छैले से छानी छाह नही,
क्या तुमको इसकी ठाह नही?
कह दो कि तुम्हे परवाह नही,
अबलाका बल अब आह नही?
जब अश्क़ नयन से बह बह कर,
मानो यमुना की धार लगे
तब सभा भवन की छत टूटी
और अम्बर के अम्बार लगे।
था अंतिम अश्रु झरने को,
थी मेरी लाज बिखरने को,
ऐसी भी कहाँ ब सेर करी?
क्यूं माधव तुमने देर करी?
कृष्णा का कृंदन कान धरा,
फिर बोले माधव सुनो जरा,
हे याज्ञसेनी हे पांचाली,
हे आर्यावर्त की रखवाली ।
मै कृष्ण कन्हाई कहता हूं,
भक्तो के हित मे रहता हूं।
मेरी आँखों मे वैर नही,
कुछ देर सही, अंधेर नही।
वो हाथ तभी कट जाने थे,
पर घड़ा पाप भर जाने दे।
कुछ तिमिर धरा पर छाने दे,
और घड़ी युद्ध की आने दे।
फिर युद्ध भूमि मे रण होगा
अपमान तेरा कारण होगा,
ये केश तेरे सुलझायेंगे
हर बद का बदला लाएंगे।
ये सभासाद चिलाएंगे,
और नभ तक धुल उड़ाएंगे
दो हाथो की बात् नही,
सो मस्तक काटे जाएंगे।