आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जब कार्ल मार्क्स ने ग़ालिब को मुक्त छंद कविता लिखने की नसीहत दी

karl marx letter to mirza ghalib
                
                                                         
                            
मिर्ज़ा ग़ालिब जहाँ उर्दू शायरी का एक बड़ा नाम हैं वहीं कार्ल मार्क्स एक मशहूर विचारक, जिन्होंने दुनिया को मार्क्सवाद का सिद्धांत दिया। आप सभी लोग इन दोनों से परिचित तो होंगे लेकिन शायद यह नहीं जानते होंगे कि ग़ालिब और मार्क्स भी एक दूसरे से परिचित थे। कुछ समय पहले तक पूरी दुनिया यही मानती आई थी कि ग़ालिब और मार्क्स भले ही समकालीन थे लेकिन एक-दूसरे से उनका कोई राब्ता नहीं था।

लेकिन यह बात तब ग़लत साबित हो गई जब 'वॉयस ऑफ अमेरिका' में कार्यरत आबिदा रिप्ले को लन्दन में स्थित इंडिया ऑफिस की लाइब्रेरी में मुग़ल काल की एक फ़टी-पुरानी किताब दिखी। जिसको उठाने पर उसमें एक से पन्ना नीचे फर्श पर गिर गया उसको उठाकर जब उन्होंने पढ़ा तो वह चौंक गईं। उनके हाथ में वह ख़त था जो मिर्ज़ा ग़ालिब ने कार्ल मार्क्स को लिखा था। काफ़ी अरसे तक खोज करने के बाद उनको मार्क्स का ग़ालिब को लिखा ख़त भी हाथ लग गया। आइये पढ़ते हैं दोनों के बीच हुए पत्राचार को!

*कार्ल मार्क्स का ग़ालिब को ख़त*

रविवार, 21 अप्रैल, 1867
लंदन, इंग्लैंड
प्रिय ग़ालिब,

दो दिन पहले दोस्त एंजल का ख़त मिला। पत्र के अंत में दो लाईनों का ख़ूबसूरत शेर था। काफी मशक्कत करने पर पता चला कि वह कोई मिर्ज़ा ग़ालिब नाम के हिन्दुस्तानी शायर की रचना है। भाई, अद्भुत लिखते हैं! मैंने कभी नहीं सोचा था कि भारत जैसे देश में लोगों के अंदर आज़ादी की क्रांतिकारी भावना इतनी जल्दी आ जाएगी। लार्ड के व्यक्तिगत लाईब्रेरी से कल आपकी कुछ अन्य रचनाओं को पढ़ा। कुछ लाईनें दिल को छू गईं।

 "हमको मालूम है ज़न्नत की हक़ीकत लेकिन,
 दिल को ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है"
 
 कविता के अगले संस्करण में इंकलाबी कार्यकर्ताओं को संबोधित करें: ज़मींदारों, प्रशासकों और धार्मिक गुरुओं को चेतावनी दें कि गरीबों, मज़दूरों का ख़ून पीना बंद कर दें। दुनिया भर के मज़दूरों मुत्ताहिद हो जाओ।

हिन्दुस्तानी शेरो-शायरी की शैली से मैं वाकिफ़ नहीं हूं। आप शायर हो, शब्दों को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। कुछ भी मौलिक लिखें, जिसका संदेश स्पष्ट हो - क्रांति। इसके अलावा यह भी सलाह दूँगा कि ग़ज़ल, शेरो-शायरी लिखना छोड़ कर मुक्त कविताओं को आज़माएं। आप ज्यादा लिख पाएंगे और इससे लोगों को अधिक सोचने को मिलेगा।

इस पत्र के साथ कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो का हिन्दुस्तानी संस्करण भेज रहा हूं। दुर्भाग्यवश पहले संस्करण का अनुवाद उपलब्ध नहीं है। अगर यह पसंद आई तो आगे और साहित्य भेजूंगा। वर्तमान समय में, भारत अंग्रेजी साम्राज्यवाद के मांद में परिवर्तित कर दिया गया है। और केवल शोषितों , मजदूरों के सामूहिक प्रयास से ही जनता को ब्रिटिश अपराधियों के शिकंजे से आज़ाद किया जा सकता है।

आप को पश्चिम के आधुनिक दर्शन के साथ-साथ एशियाई विद्वानों के विचारों का अध्ययन भी करना चाहिए। मुगल राजाओं और नवाबों पर झूठी शायरी करना छोड़ दें। क्रांति निश्चित है। दुनिया की कोई ताक़त इसे रोक नहीं सकती।

मैं हिंन्दुस्तान को क्रांति के निरंतर पथ पर चलने के लिए शुभकामना देता हूं।

आपका,
कार्ल मार्क्स
आगे पढ़ें

मिर्ज़ा ग़ालिब का कार्ल मार्क्स को ख़त

4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर