विज्ञापन

भीष्म ने जीवन वार दिया

User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भीष्म ने जीवन वार दिया
        
                                                    
                            

गंगा की लहरें बोल उठीं—
यह बालक असाधारण था,
शस्त्र, शास्त्र, नीति के पथ पर,
देवव्रत अनुपम साधक था।
राजमुकुट सम्मुख था, फिर भी,
मोह सभी का मार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

शांतनु की बुझती आँखों में,
एक अधूरा सपना था,
सत्यवती से बिछुड़ रहा जो,
मौन हृदय का तपना था।
पिता के मुख पर हँसी सजाकर,
अपना सुख भी वार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

सिंहासन चरणों में रखकर,
राज्य स्वयं ठुकराया था,
सत्यवती के पुत्रों को ही,
राज्याधिकार दिलाया था।
ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर,
वंश-मोह बिसार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

आकाश ने पुष्पों से उस दिन,
भीष्म-व्रत का मान किया,
शांतनु ने इच्छामृत्यु देकर,
पुत्र-त्याग सम्मान किया।
मृत्यु तक को वश में करके,
काल पर अधिकार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

हस्तिनापुर का राजमुकुट जब,
बार-बार डगमगाता था,
चित्रांगद-विचित्रवीर्य का,
भार वही उठाता था।
राजा बने बिना भी कुल को,
जीवन भर आधार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

काशी की तीन राजकुमारियाँ,
कुरुकुल हेतु वे लाए थे,
अंबिका और अंबालिका को,
विचित्रवीर्य से ब्याहे थे।
अंबा का मन शाल्व में जाना—
उस इच्छा को सत्कार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

अंबा जब अस्वीकार हुई तो,
लौट पुनः वह आई थी,
पर भीष्म-व्रत की दृढ़ सीमा,
राह रोकने आई थी।
उसकी पीड़ा सत्य मानकर,
कथा को नया विचार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

परशुराम ने शस्त्र उठाया,
घोर समर तब छाया था,
गुरु के सम्मुख अडिग शिष्य ने,
रण-कौशल दिखलाया था।
गुरु का मान, प्रण की रक्षा—
दोनों को सम्मान दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

कुरुवंश की कोमल पौधों को,
उन्होंने वृक्ष बनाया था,
धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर को,
जीवन-पाठ पढ़ाया था।
राजकुमार की हर पीढ़ी को,
नीति-धर्म-संस्कार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

द्रौपदी के कठिन प्रश्न पर,
धर्म स्वयं अकुलाया था,
राजसभा के बंधन में उनका,
मौन उन्हें तड़पाया था।
उस विवशता ने जीवन भर,
अंतरमन को घाव अपार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

शांति-दूत बन कृष्ण पधारे,
भीष्म ने साथ निभाया था,
पांडव को अधिकार मिले यह,
कुरु-दरबार समझाया था।
युद्ध रुके—इस अंतिम आशा को,
भीष्म ने हर विस्तार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

कौरव-ध्वज के नीचे तन था,
मन पांडव के साथ रहा,
हस्तिनापुर के सिंहासन से,
अंत समय तक नाता रहा।
धर्म और कर्तव्य की खातिर,
तन कर्तव्य पर वार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

रणभेरी के प्रथम दिवस से,
शौर्य प्रखर दिखलाया था,
दस दिन तक उस वृद्ध धनुर्धर ने,
कुरुक्षेत्र दहलाया था।
वृद्ध देह में वीर हृदय ने,
पराक्रम को विस्तार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

शिखंडी को सम्मुख पाकर,
भीष्म ने धनुष झुकाया था,
नारी पर शस्त्र न उठेगा—
अपना प्रण दोहराया था।
मृत्यु सामने खड़ी रही पर,
अपने प्रण को मान दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

बाणों की शय्या ने उस दिन,
घायल वीर सँभाला था,
धरती पर तन गिर न पाए,
हर शर ने तन थामा था।
पीड़ा को भी धैर्य बनाकर,
शर को तन का भार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

प्यास जगी जब शर-शय्या पर,
अर्जुन ने धनुष उठाया था,
तीर भूमि के हृदय लगा तो,
जल का स्रोत बहाया था।
पार्थ-बाण ने धरती चीरकर,
पितामह को जलधार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

सूर्य-दिशा के बदलने तक वे,
मृत्यु-द्वार पर ठहरे थे,
उत्तरायण आने तक भी,
प्राण-संकल्प में गहरे थे।
इच्छामृत्यु के तेजस्वी ने,
मृत्यु को इंतज़ार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

शर-शय्या भी गुरुकुल बनकर,
धर्म-दीप जलाती थी,
राजधर्म से मोक्षधर्म तक,
नीति राह दिखाती थी।
युधिष्ठिर के संशय हरकर,
ज्ञान अनंत अपार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

विष्णु के सहस्र नामों का,
पावन गान सुनाया था,
व्याकुल मन को शांति मिले—यह,
शाश्वत मार्ग बताया था।
अंतिम साँसों तक मानव को,
भक्ति का आधार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥

सिंहासन से शर-शय्या तक,
सबका भार उठाया था,
पिता, कुल और वचन बचाने,
अपना सुख ठुकराया था।
अपने सपने राख बनाकर,
जग का भाग्य सँवार दिया।
अपना हर अधिकार दिया,
भीष्म ने जीवन वार दिया॥
—संतोष कुमार शर्मा
11 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Vijay BindaasRaja

192 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12711 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10438 कविताएं

View Profile