हँसते-हँसते रो पड़ी वो,
सज धजकर जब आई थी।
पलकें नम थीं सबकी,
क्योंकि आज विदाई थी।
बचपन की वो बातें,
आज याद बहुत आई थीं।
झूला, गुड़िया, खेल खिलौने,
सबकी याद सजाई थी।
माँ का दामन थामा उसने,
बोल न पाई, बस मुस्काई थी।
दिल तो चाहता था रुक जाऊँ,
पर रस्मों ने कहा रिहाई दी।
पापा ने जब सर सहलाया,
आँखों में नमी समाई थी।
बेटी नहीं थी वो सिर्फ,
उनकी जान थी, परछाई थी।
डोली उठी तो दिल टूटा,
साँसे भी भारी हो आई थीं।
हाथ हिलाकर जाते-जाते,
आँखों ने आखिरी विदाई दी।