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खुद से मिलने वाली पहली और ज़रूरी साँस लिखती।

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अगर मैं कभी लेखिका होती,
        
                                                    
                            
तो खुद को बहुत खास लिखती।
मेरी ज़िंदगी में हुए हर लम्हे की सीख पर
एक किताब लिखती।
दुनिया से सीखा अनुभव
अपने साथ लिखती।
हर चीज़ से लड़कर बनी
नई इंसान लिखती।
यूँ तो मैं बनी रही बस ऑप्शन लोगों में,
पर फिर भी मैं खुद को
खुद से मिलने वाली पहली और ज़रूरी साँस लिखती।
लिखती मैं खुद के विचारों के बारे में,
फिर हर हार में छिपी जीत के बारे में।
लोगों को लगता है,
भोली-भाली लड़की है, तोड़ दिया हमने।
लेकिन फिर लिखती
उनको छोड़कर बनी सकारात्मक सोच के बारे में।
ऐसे में खुद को अल्फ़ाज़ों में बुनती।
अगर मैं एक लेखिका होती,
तो यूँ खुद को खास लिखती। 

 
9 घंटे पहले
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