कभी-कभी लगता है,
जैसे थक गई हैं राहें,
जैसे मंज़िल ने भी
मुँह मोड़ लिया हो,
जैसे आँखों में पलते सपनों ने
चुपचाप दम तोड़ दिया हो।
कभी कोई अपना छूट जाता है,
कभी कोई सपना टूट जाता है,
कभी वक़्त की बेरुख़ी से
मन भीतर तक रूठ जाता है।
और तब...
बहुत मन करता है
सब कुछ छोड़ देने का,
उन रास्तों से लौट जाने का
जहाँ कोई उम्मीद नहीं,
कोई इंतज़ार नहीं।
लेकिन तभी
मन के किसी कोने से
एक धीमी-सी आवाज़ आती है—
“अभी कहानी बाकी है...”
जो आँसू आज
आँखों में ठहरे हैं,
कल वही ताक़त बनेंगे।
जो घाव आज
भीतर तक तोड़ रहे हैं,
कल वही दूसरों का
दर्द समझना सिखाएँगे।
तो फिर क्यों रुकना है,
क्यों इन अँधेरों से डरना है?
हर रात की गोद में
एक सवेरा पलता है,
हर टूटे हुए ख़्वाब में
एक नया सपना जन्म लेता है।
बस चलती रह—
भले कदम छोटे हों,
भले राह कठिन हो,
क्योंकि मंज़िल से पहले
ख़ुद पर विश्वास तक पहुँचना ज़रूरी है।
और याद रखना—
जो आज बिखरे है,
वही कल निखरेंगे,
जो आज रो रहे है,
वही एक दिन
मुस्कुराकर कहेंगे—
“हम हारकर भी
हारे नहीं ।”
-रोशनी पाण्डेय