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तपता मन

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रिश्ते अजीज मगर तपता मन
        
                                                    
                            
तरह-तरह की तृष्णा से हुई अनमन
अपराध यहाँ पर नही किसी का
बढ़ी जरूरत ने खाली किया आँगन

सकरी गालियों के अपने ही माने
चौड़ी गालियों का राज छुपाना मुश्किल
उम्मीदों के साये में इंतजार करते
थके हुए रिश्ते बैठे चाहते बखूबी दखल

जिन अधरों से कभी फूल झरते
वही मुरझाए से नजर मिलाने से कटते
प्रेम समुन्दर सूख गया 'उपदेश'
प्यासे अंजुरी भर को हम सभी तरसते
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
22 घंटे पहले
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