आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तपता मन

                
                                                         
                            रिश्ते अजीज मगर तपता मन
                                                                 
                            
तरह-तरह की तृष्णा से हुई अनमन
अपराध यहाँ पर नही किसी का
बढ़ी जरूरत ने खाली किया आँगन

सकरी गालियों के अपने ही माने
चौड़ी गालियों का राज छुपाना मुश्किल
उम्मीदों के साये में इंतजार करते
थके हुए रिश्ते बैठे चाहते बखूबी दखल

जिन अधरों से कभी फूल झरते
वही मुरझाए से नजर मिलाने से कटते
प्रेम समुन्दर सूख गया 'उपदेश'
प्यासे अंजुरी भर को हम सभी तरसते
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर