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नींद का आना दूभर

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आईना बाते करने को मजबूर हो गया।
        
                                                    
                            
तन्हाइयाँ जायेगी उसको मंजूर हो गया।।

किताब में दबाकर रख दिये खत उसके।
ख्यालों में खोए रहने का दस्तूर हो गया।।

उसे गले लगाए हुए कितने दिन बीत गए।
इसका हिसाब-किताब रखना दूर हो गया।।

शाम की विषमताएं परेशानी में डाल रही।
हर रात में नींद का आना दूभर हो गया।।

मौका ताड़ लेती फुर्सत बैठने का 'उपदेश'।
रोज रोज मुझे चिढ़ाने का दस्तूर हो गया।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
5 घंटे पहले
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