आईना बाते करने को मजबूर हो गया।
तन्हाइयाँ जायेगी उसको मंजूर हो गया।।
किताब में दबाकर रख दिये खत उसके।
ख्यालों में खोए रहने का दस्तूर हो गया।।
उसे गले लगाए हुए कितने दिन बीत गए।
इसका हिसाब-किताब रखना दूर हो गया।।
शाम की विषमताएं परेशानी में डाल रही।
हर रात में नींद का आना दूभर हो गया।।
मौका ताड़ लेती फुर्सत बैठने का 'उपदेश'।
रोज रोज मुझे चिढ़ाने का दस्तूर हो गया।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X