विज्ञापन

बेचैन रूह अपने इश्क के अस्तबल में रही।

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तैयारियाँ करते-करते मौसम बदल गया।
        
                                                    
                            
दरवाजा ना खटका इंतजार का पल गया।।

मोहब्बत बन्द कमरे में साँसे भरे तो कैसे।
उबासी आई गई अँधेरे का पल पल गया।।

मेरे मुसाफिर के पैरों में छाले हो गए जैसे।
एहतियातन जूते में कंकड सा सबल गया।।

मुझे कोई इल्म नही बदकिस्मती ही होगी।
रूह क्या करे मेहमान रूह का बदल गया।।

बेचैन रूह अपने इश्क के अस्तबल में रही।
खटका से 'उपदेश' दिल को पता चल गया।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
13 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Nathuram Kaswan

8651 कविताएं

View Profile

SATYENDRA KUMAR

112 कविताएं

View Profile