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बेचैन रूह अपने इश्क के अस्तबल में रही।

                
                                                         
                            तैयारियाँ करते-करते मौसम बदल गया।
                                                                 
                            
दरवाजा ना खटका इंतजार का पल गया।।

मोहब्बत बन्द कमरे में साँसे भरे तो कैसे।
उबासी आई गई अँधेरे का पल पल गया।।

मेरे मुसाफिर के पैरों में छाले हो गए जैसे।
एहतियातन जूते में कंकड सा सबल गया।।

मुझे कोई इल्म नही बदकिस्मती ही होगी।
रूह क्या करे मेहमान रूह का बदल गया।।

बेचैन रूह अपने इश्क के अस्तबल में रही।
खटका से 'उपदेश' दिल को पता चल गया।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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1 hour ago

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