एहसास की लौ को मौन की आँधी बुझा न सकीं।
सिलसिला आज भी कायम गरमी मिटा न सकीं।।
दिलों के बीच की दूरी ने अपना काम किया नही।
खबर लेने को छटपटाती दिले दर्द मिटा न सकीं।।
हौसले का इम्तिहान चल रहा कब तक साथ देगा।
ख्वाबों में मौज करती हकीकत को मिटा न सकीं।।
लोग जान भी पाए उसका दायरा कहाँ तक रहा।
बिना फरेब के गले लगाने का फर्ज मिटा न सकीं।।
कदम राह-ए-मोहब्बत में अब भी कायम 'उपदेश'।
चुप रहकर सम्भाला खुद को अर्ज़ मिटा न सकीं।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'