विज्ञापन

अपने भीतर झाँक लेते अगर शिक्षित होते

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शिखर पर पहुँच कर खुशी जाती रही।
        
                                                    
                            
चरित्र ने बौना बनाया इज़्ज़त जाती रही।।

ऊँचाई पर टिके रहना किस्मत में न था।
बुराईयों के बीच फंसकर चैन जाती रही।।

अंहकार ईर्ष्या क्रोध और छल- कपट से।
बनाई विश्व गुरू की पदवी भी जाती रही।।

अपना मन बुराईयों से ऊपर उठ ना पाया।
जग को जीतने की अभिलाषा जाती रही।।

दंद-फंद से दौलत जोड़ी हवा में घूमे फिरे।
लम्बे-लम्बे 'उपदेश' मन की बात जाती रही।।

अपने भीतर झाँक लेते अगर शिक्षित होते।
भँवर में फंसकर गरीबो की हाय खाती रही।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
18 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all