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धड़कनो को जुबान नही होता।।

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब तक तजुर्बा नही होता।
        
                                                    
                            
सुनने पर यकीन नही होता।।

गुजरे हुए लम्हों में तुम रही।
अब तुम्हारा मन नही होता।।

अधूरेपन से पोषित हो रही।
आशिकी में जमीं नही होता।।

जिन्दगी का मायाजाल रहेगा।
आज घरों में आँगन नही होता।।

इश्क तो बस हसरतो में रहा।
धड़कनो को जुबान नही होता।।

अन्दर आग सुलगती 'उपदेश'।
ऐसे धुएँ में अमन नही होता।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक महीने पहले
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