अब थकने लगी ख्वाहिशें हमदर्द के साथ।
पूछती हूँ बताओ किसलिए थामा था हाथ।।
बन्द कमरे में कभी गूँजी थी तुम्हारी हँसी।
गुफ़्तगू जारी बेहतरीन अल्फाजों के साथ।।
याद है रेत पर नाम लिखकर छोड़ा कभी।
हालात पूछने आती लहरें बड़े गर्व के साथ।।
तेरे रुखसारो पर ठहरी कभी ओस की बूँदें।
महताब समझकर चूमा ज़ज्बात के साथ।।
अब जरा सी बेरुखी से फेरी जाती नजर।
वक्त उबाऊ सा हो गया फिसलन में साथ।।
पहले जैसा न मौसम रहा न साथ 'उपदेश'।
क्या उम्र भर चलना पड़ेगा बड़े दर्द के साथ।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'