विज्ञापन

नसीब से निकली 'उपदेश' फिर कभी न मिली।

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम्हारे मुरीद हुए जब से तेरी नजरे मिली।
        
                                                    
                            
कुछ वक्त सामने रही फिर कभी न मिली।।

गुफ़्तगू हुई उस दरमियाँ साथ घूमे फिरे भी।
खुशमिजाज शख्सियत फिर कभी न मिली।।

कसम खुदा की एहसास बहुत दिलाती मुझे।
खबर का भी रास्ता टूटा फिर कभी न मिली।।

आस्तिक ज़न का चमत्कार पर भरोसा होता।
नसीब से निकली 'उपदेश' फिर कभी न मिली।।

- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
4 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dr fouzia

6910 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10926 कविताएं

View Profile

Dn Chaubey

7409 कविताएं

View Profile