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आजाद सोच थी आज वह भी बंदिश में

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक आजाद सोच थी आज वह भी बंदिश में।
        
                                                    
                            
ऐसे दिन लाने में कई बर्ष लगे होंगे साज़िश में।।

जब दिल से कोई उतर जाए फिर कहाँ सुकून।
बोझिल लगने लगे जिन्दगी व्यर्थ की संशय में।।

मेरी ग़ज़ल पढ़ने वाले ढूँढ़ते होंगे कोई निशान।
जिससे पहचाना जाए अर्थ तंत्र असमंजस में।।

हसीन वादियों का कोई क्या करे जेबें खाली है।
जुगनू सी चमकती बुझती 'उपदेश' ख्वाहिश में।।

दुनिया सँवर रही बस हम जैसो की सामत आई।
घुट घुट कर जीना भी कोई जीना इस बंदिश में।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
6 घंटे पहले
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