विज्ञापन

वाह! रे पैसा

Umesh Shukla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वाह रे! पैसा, वाह रे! पैसा
        
                                                    
                            
रूप तेरा मणि-रत्न जैसा,
हो चाहे गंदा या हो मैला,
लोग रखें जैसा, वैसा पैसा।
क्या कमाल कर रखा है तूने,
आदम के दिमाग पर ऐसा।

वाह रे! पैसा, वाह रे! पैसा
वाह रे! पैसा, वाह रे! पैसा

खिलते हैं चेहरे रोते हुए,
बनते हैं रिश्ते टूटे हुए।
माना कि पैसा ऐसा है,
जिसका न कोई जैसा है।

वाह रे! पैसा, वाह रे! पैसा
वाह रे! पैसा, वाह रे! पैसा

पैसा है तो ऐसा है
पूछते सब लोग — “तू कैसा है?”
मैं जैसा था, मैं वैसा हूँ,
अभिमानयुक्त, कटु-मुख सा हूँ।
वाह रे! पैसा, वाह रे! पैसा।

आशा है कि यह कविता आपके पाठकों को पसंद आएगी।
- परीक्षित शुक्ल
 
7 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile

RATAN KUMAR

613 कविताएं

View Profile

Sandeep Singh

4538 कविताएं

View Profile